अवध

इमामबाड़ा सफदर अली बेग से अकीदत के साथ निकला ऐतिहासिक दुलदुल का जुलूस

प्रयागराज (आलोक गुप्ता). माहे मोहर्रम की सातवीं को 1836 में क़ायम किया गया दुलदुल का गश्ती जुलूस इमामबाड़ा सफदर अली बेग (पान दरीबा) से भोर में निकाला गया, जो पूरे दिन और रात भर विभिन्न इलाक़ों में गश्त करते हुए अपने क़दीमी इमामबाड़े पर पहुंच कर समाप्त हुआ। शाहगंज स्थित पानदरीबा से लगभग 187 साल से इमामबाड़ा सफदर अली बेग से निकाला जाने वाला दुलदुल का ऐतिहासिक जुलूस इस वर्ष भी अक़ीदत व ऐहतेराम के साथ निकला।

शाहगंज, पत्थर गली, बरनतला, मिन्हाजपुर, नखास कोहना, अहमदगंज, क़ाज़ीगंज, बख्शी बाज़ार, तारा बाबू की गली, अकबरपुर, रोशनबाग़, सियाह मुर्ग़, बुड्ढा ताज़िया, पुराना गुड़िया तालाब, दायरा शाह अजमल, बैदन टोला, कोलहन टोला, हसन मंज़िल, रानीमंडी, धोबी गली, यादगार हुसैनी गली, बच्चाजी धर्मशाला, डा. काटजू रोड, कोतवाली, लोकनाथ चौराहा, गुड़मंडी, बहादुरगंज, अग्रसेन चौराहा, इमाम वज़ीर हुसैन छोटी चक, घंटाघर, सब्ज़ी मंडी आदि क्षेत्रों में घर-घर गश्त करने के उपरांत इमामबाड़ा सफदर अली बेग पर संपन्न हुआ।

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दुलदुल जुलूस के आयोजक मिर्ज़ा बाबर बेग, सुहैल, शमशाद, जहांगीर, सलीम, मुन्ना, माहे आलम, छोटे बाबू, मुर्तु़ज़ा अली बेग, मुज्तबा अली बेग, रिज़वान, सादिक़ आदि 24 घंटों के दुलदुल के गश्ती जुलूस में सिलसिलेवार एक-एक घरों में दुलदुल ले जाने क्रम में सहयोग करते रहे।

दूध-जलेबी, चने की भीगी दाल खिला किया अक़ीदत का इज़हारः सफेद चादर को खूनी रंग से छींटे देकर और गुलाब व चमेली के फूलों से सजाकर घर-घर ज़ियारत कराने के साथ अक़ीदतमंदों ने दुलदुल घोड़े को जहां दूध-जलेबी खिलाई तो वहीं कुछ लोगों ने भीगी चने की दाल से भी दुलदुल का आदर और सत्कार किया। मन्नती दुलदुल पर सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए सुन्नी समुदाय की महिलाएं भी हाथों में दूध-जलेबी और भीगी चने कीदाल का कटोरा लिए इंतजार करती दिखीं। एक ऐसा नज़ारा भी देखने को मिला जो अपने पुरखों की परंपरा को निभाते हुए डा. चड्ढा रोड लोकनाथ व गुड़ मंडी में हिंदू महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने दुलदुल घोड़े के नीचे से निकाल कर मुरादें मांगीं।

दो दर्जन अलम के साथ इमामबाड़े में गया दुलदुल जुलूसः दादा-परदादा के समय से चली आ रही परंपरा को निभाते हुए मुरादाबाद से खास सातवीं मोहर्रम के जुलूस में शरीक होने आए इंतेज़ार मेंहदी ने दो दर्जन से अधिक अलम के साए में बरसों पुराना नौहा -इस्लाम के दुश्मन पीते थे दरिया में छलकता था पानी! वो चमका अलम वो निकले चचा! घबराओ के न अब आया पानी!, डा. मुस्तफा के हाते से दो दर्जन से अधिक अलम लेकर इमामबाड़ा अली नक़ी जाफरी दायरा शाह अजमल पहुंचे नौजवान दुलदुल को साथ लेकर नौहा पढ़ते हुए निकले। दायरा तिराहे पर कुछ देर रुकने के बाद मातमी जुलूस डा. मुस्तफा तक गया। वहां पहले दुलदुल घोड़े को विश्राम देने के बाद दूसरा घोड़ा सजाया गया, जो रानीमंडी के साथ बाक़ी घरों में ले जाया गया।

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बहादुरगंज तक मातमदारों ने किया ज़ंजीरों से किया मातमः रानीमंडी से माहे मोहर्रम की सातवीं पर अंजुमन हैदरिया, अंजुमन मज़लूमिया, अंजुमन अब्बासिया व अंजुमन आबिदया ने नौहों और मातम की सदाओं के साथ जुलूस निकाला, जो कोतवाली पहुंचकर ज़ंजीरी मातम करते हुए लोकनाथ चौराहा, बहादुरगंज, बताशा मंडी से मुड़कर इलाहाबाद डिग्री कालेज होते हुए इमामबाड़ा वज़ीर हैदर छोटी चक तक गया। अंजुमन ग़ुंचा-ए-क़ासिमया के प्रवक्ता सैय्यद मोहम्मद अस्करी के अनुसार सभी मातमी अंजुमनों के सदस्यों ने कोतवाली के रास्ते जुलूस के खत्म होने तक तेज़ धार की छूरियों से लैस ज़ंजीरों से पुश्तज़नी कर अपने आप को लहूलुहान कर लिया। अंजुमन हैदरिया के नौहाख्वान हसन रिज़वी, मज़लूमिया के नौहाख्वान राजन व अरशद, अब्बासिया के नौहाख्वान डा. अबरार व फ़ैज़ जाफरी अंजुमन आबिदया के नौहाख्वान मिर्ज़ा काज़िम अली आदि ने पुरदर्द नौहा पढ़ा। इसमें गौहर क़ाज़मी, डा. ज़की, शेरु भाई, रज़ा अब्बास ज़ैदी, भय्यू भाई, नायाब बलियावी, नजीब इलाहाबादी, कौसर अस्करी, वक़ार हुसैन, मसूद हुसैन, सैय्यद मोहम्मद अस्करी, हसन नक़वी, आसिफ रिज़वी, इशत आब्दी, तक़ी आब्दी, शजीह अब्बास, ज़ामिन हसन आदि शामिल रहे।

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