
नई दिल्ली. भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को एक और महत्वपूर्ण सफलता मिली है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने शक्तिशाली क्रायोजेनिक इंजन सीई-20 का सफल परीक्षण कर देश की उन्नत रॉकेट प्रोपल्शन क्षमता को और मजबूत कर दिया है। इस उपलब्धि को अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने शनिवार को इस सफलता पर इसरो के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि तमिलनाडु के महेंद्रगिरी स्थित इसरो प्रोपल्शन कॉम्प्लेक्स में 22 टन थ्रस्ट स्तर पर सीई-20 क्रायोजेनिक इंजन का सफल परीक्षण किया गया।
इस परीक्षण के दौरान इंजन में उन्नत नोजल प्रोटेक्शन सिस्टम और मल्टी-एलिमेंट इग्नाइटर तकनीक का उपयोग किया गया। इन तकनीकों का उद्देश्य इंजन की विश्वसनीयता और दक्षता को बढ़ाना है, ताकि भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों में बेहतर प्रदर्शन सुनिश्चित किया जा सके।
जानकारी के अनुसार परीक्षण के दौरान इंजन ने लगभग 165 सेकंड तक स्थिर रूप से संचालन किया और करीब 22 टन थ्रस्ट उत्पन्न किया। इस सफल परीक्षण से यह साबित हुआ कि इंजन निर्धारित मानकों के अनुरूप कार्य करने में सक्षम है।
सीई-20 इंजन भारत के भारी प्रक्षेपण यान एलवीएम-3 (LVM-3) के ऊपरी चरण को शक्ति प्रदान करता है। यही प्रक्षेपण यान देश के बड़े और भारी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने के लिए उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, यह इंजन भारत के महत्वाकांक्षी गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस परीक्षण की सफलता से भारत की स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक और अधिक सुदृढ़ होगी। इससे भविष्य में बड़े उपग्रह प्रक्षेपण, गहरे अंतरिक्ष मिशन और मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रमों को नई गति मिलने की संभावना है।

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