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“मजदूर आपूर्ति केंद्र” बनता जा रहा हमारा बिहारः प्रशांत किशोर

The live ink desk. बिहार की मौजूदा सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर तीखी टिप्पणी करते हुए प्रशांत किशोर ने राज्य में रोजगार, शिक्षा और विकास के मुद्दों को लेकर गंभीर सवाल उठाए। सुपौल जिले में ‘बिहार नवनिर्माण अभियान’ के तहत आयोजित एक संवाद कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि यदि समाज अपने बच्चों के भविष्य को लेकर सजग नहीं होगा, तो किसी भी राजनीतिक नेतृत्व से बदलाव की अपेक्षा करना व्यर्थ है। उन्होंने दावा किया कि राज्य में बेरोजगारी और पलायन की समस्या लगातार बढ़ रही है, जिससे बिहार “मजदूर आपूर्ति केंद्र” बनता जा रहा है।

कार्यक्रम शहर के विद्यापुरी क्षेत्र में आयोजित हुआ, जिसमें करीब 200 से अधिक बुद्धिजीवियों ने भाग लिया। इस दौरान पूर्व विधायक किशोर कुमार मुन्ना, पूर्व डीजीपी स्तर के अधिकारी जय प्रकाश सिंह और पूर्व आईएएस अधिकारी ललन कुमार यादव सहित कई प्रमुख लोग मौजूद रहे। चर्चा के दौरान प्रशांत किशोर ने कहा कि चुनाव के छह महीने बाद भी रोजगार सृजन और आर्थिक सुधार के मोर्चे पर अपेक्षित प्रगति नहीं दिखी है। उन्होंने आंकड़ों के संदर्भ में कहा कि राज्य की वित्तीय स्थिति सीमित संसाधनों के कारण दबाव में है, जिससे नई नौकरियों के सृजन की गति प्रभावित हो रही है।

राजनीतिक परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने संकेत दिया कि नए नेतृत्व के गठन के बाद भी यदि नीतिगत बदलाव नहीं हुआ, तो राज्य में पलायन और बढ़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनने वाली सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार और बुनियादी ढांचे को मजबूत करना होगा।

अपने संगठन ‘जन सुराज’ के प्रदर्शन पर बोलते हुए प्रशांत किशोर ने कहा कि हालिया चुनाव में मिले लगभग 16 लाख वोट इस बात का संकेत हैं कि राज्य में बदलाव की मांग मौजूद है। उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि किसी एक चुनावी परिणाम से आंदोलन की दिशा तय नहीं होती और दीर्घकालिक बदलाव के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक है।

इतिहास का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि बड़े सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन समय और धैर्य की मांग करते हैं। इसी क्रम में उन्होंने बताया कि चुनाव के बाद पश्चिम चंपारण स्थित गांधी भितिहरवा आश्रम में संगठन के नेताओं ने एक दिवसीय उपवास रखकर आत्ममंथन किया था और नई सरकार को अपने वादों को पूरा करने के लिए छह महीने का समय देने का निर्णय लिया गया था।

विश्लेषकों के अनुसार, बिहार में रोजगार, शिक्षा और आर्थिक विकास जैसे मुद्दे आने वाले समय में राजनीतिक बहस के केंद्र में रहेंगे, और इन पर सरकार की नीतियां ही राज्य की दिशा तय करेंगी।

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