अवध

जैन तीर्थ श्री सम्मेद शिखरजी को पर्यटन स्थल बनने से बचाएं : रेवतीरमण

जैन समुदाय के लोगों ने मंडलायुक्त को ज्ञापन सौंपा

प्रयागराज (आलोक गुप्ता). जैनियों के सर्वोच्च जैन तीर्थ श्री सम्मेद शिखरजी को पर्यटन स्थल बनाए जाने के विरोध में बुधवार को जैन समाज के लोगों ने मंडलायुक्त दफ्तर पर प्रदर्शन किया। पूर्व सांसद कुंवर रेवती रमण सिंह ने मंडलायुक्त कार्यालय पर उपस्थित सैकड़ों की संख्या में जैन समाज के लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि 26 मार्च 2022 को विश्व जैन संगठन ने जंतर मंतर दिल्ली में प्रदर्शन किया था।

पूर्व सांसद ने कहा, तब यह प्रकरण जानकारी में आया और जैन धर्मावलंबियों की भावनाओं को समझते हुए और प्रकरण की गंभीरता को जानते हुए हमने 29 मार्च को राज्यसभा में यह प्रकरण उठाया गया था। जिसमें सर्वोच्च जैन तीर्थ श्री सम्मेद शिखरजी को इको सेंसिटिव जोन घोषित कर वहाँ गैर धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाने, पर्यावरण पर्यटन की अनुमति देने के लिए वर्ष 2018-19 मे झारखंड सरकार द्वारा अनुसंशा किए जाने पर केंद्रीय वन मंत्रालय द्वारा दो अगस्त, 2019 को अधिसूचना, क्रमांक 2795 (अ) जारी की गई, जिससे पूरे जैन समाज की भावनाएं आहत हुई हैं और वह आक्रोशित है। इस मुद्दे को लेकर विश्व जैन संगठन के आह्वान पर आज पूरे देश का जैन समाज आंदोलनरत है।

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पूर्व सांसद ने कहा, जैन समाज इसलिए भी आशंकित, भयभीत व आक्रोशित है क्योंकि अब से लगभग 20 वर्ष पूर्व जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की मोक्षस्थली गिरनार पर्वत, जो कि गुजरात के जूनागढ़ में स्थित है, को भी जैन पूजन व जैन समाज के वंदना के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। वहां नेमिनाथ भगवान के चरण चिन्हों को हटाकर मूर्ति स्थापित कर अतिक्रमण किया गया। उन्होंने कहा कि वहां जैन यात्रियों को जैन धर्म की जय बोलने पर या जैन पद्धति अनुसार पूजन अर्चन करने पर मारपीट गाली-गलौच की जाती है। यहां तक की जैन मुनि प्रबल सागर महाराज पर भी चाकुओं से जानलेवा हमला किया गया, जिसके निशान आज तक मौजूद हैं।

पूर्व सपा प्रदेश प्रवक्ता विनय कुशवाहा ने कहा कि सांसद कुंवर रेवती रमण सिंह ने भारत सरकार से मांग किया कि जैन धर्म के सर्वोच्च आस्था के केंद्र श्री सम्मेद शिखरजी की व उसकी स्वतंत्र पहचान बरकरार रखें और साथ ही सरकार से यह भी मांग करता हूं कि जैनियों को गिरनार पर्वत पर भी उनका अधिकार वापस मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि केंदीय वन मंत्रालय, विश्व जैन संगठन की 17 मार्च 2022 को भेजी गई मांगों पर उक्त अधिसूचना में संशोधन करें, ताकि जैन तीर्थ की पवित्रता व स्वतंत्र पहचान बनी रहे।

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