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शंकराचार्य के निर्धारण का अधिकार सरकार को नहीं : स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद

प्रयागराज (आलोक गुप्ता). ज्योतिषपीठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने माघ मेला प्रशासन पर उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवहेलना करने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि शंकराचार्य कौन होगा, यह न तो देश के राष्ट्रपति तय कर सकते हैं और न ही किसी राज्य के मुख्यमंत्री को इसका अधिकार है।

मंगलवार को पत्रकारों से बातचीत में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रयागराज मेला प्राधिकरण द्वारा जारी नोटिस को गलत और न्यायालयीय आदेशों के विपरीत बताया। उन्होंने कहा कि जिस सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देकर नोटिस दिया गया है, उसी आदेश की अवमानना मेला अधिकारियों द्वारा की गई है। इस प्रकरण में वे नोटिस का विधिसम्मत जवाब भी देंगे और अवमानना याचिका भी दायर करेंगे।

उन्होंने आरोप लगाया कि मेला प्रशासन ने प्रेस वार्ता के माध्यम से भ्रामक जानकारी प्रसारित की। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि किसी एक पीठ का शंकराचार्य अन्य तीन पीठों की मान्यता से ही स्वीकार्य होता है और यह धार्मिक परंपरा है, जिसमें किसी संवैधानिक पदाधिकारी का हस्तक्षेप संभव नहीं है।

इस अवसर पर उनके अधिवक्ता डॉ. पी.एन. मिश्रा ने कहा कि उच्चतम न्यायालय और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के किसी भी आदेश में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य कहलाने से रोकने का निर्देश नहीं है। उन्होंने बताया कि न्यायालय ने स्वयं आदेशों में उन्हें ‘शंकराचार्य’ संबोधित किया है। अधिवक्ता के अनुसार, ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा 1 फरवरी 2017 को पंजीकृत वसीयतनामे के आधार पर पट्टाभिषेक किया गया था, जिसे गुजरात उच्च न्यायालय ने वैध माना है।

अधिवक्ता ने यह भी कहा कि जबकि न्यायालय के आदेश के अनुसार चार पीठों के अतिरिक्त किसी अन्य को शंकराचार्य लिखने का अधिकार नहीं है, फिर भी मेला क्षेत्र में कई लोग स्वयं को शंकराचार्य बता रहे हैं, जिन पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दोहराया कि मेला प्राधिकरण के नोटिस का जवाब निर्धारित समय में भेजा जाएगा और साथ ही उच्चतम न्यायालय में अवमानना की कार्यवाही भी शुरू की जाएगी।

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