
नई दिल्ली. सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण उत्तरी सिक्किम में बुनियादी ढांचे को नई मजबूती देते हुए रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने चुंगथांग-लाचेन एक्सिस और 400 फीट लंबे बेली सस्पेंशन ‘ताराम चू’ पुल का उद्घाटन किया। यह परियोजना सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा पुनर्निर्मित की गई है और हाल के वर्षों में आई प्राकृतिक आपदाओं के बाद संपर्क बहाली की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
आपदाओं के बाद पुनर्निर्माण की मिसाल
उत्तरी सिक्किम ने मई-जून 2025 के विनाशकारी बादल फटने, जून 2024 में आए चक्रवात ‘रेमल’ और अक्टूबर 2023 की हिमनदी झील विस्फोट बाढ़ जैसी आपदाओं का गंभीर प्रभाव झेला था। इन घटनाओं के कारण सड़क संपर्क और पुलों को भारी क्षति पहुंची थी।
बीआरओ ने चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों में तेजी से काम करते हुए संचार व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया। ‘स्वास्तिक परियोजना’ के अंतर्गत 96 भूस्खलनों को हटाया गया, चार प्रमुख पुलों का निर्माण किया गया और दो अन्य पुलों की मरम्मत की गई। इंजीनियरिंग टीम ने 8 किलोमीटर की नई भू-सफाई पूरी की तथा अस्थिर ढलानों और धंसाव वाले क्षेत्रों से बचाव के लिए वैकल्पिक मार्ग विकसित किए।
सामरिक और नागरिक—दोनों के लिए अहम
28 किलोमीटर लंबे चुंगथांग-लाचेन मार्ग और ताराम चू पुल के पूर्ण होने से न केवल स्थानीय निवासियों की आवाजाही सुगम होगी, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों की त्वरित तैनाती और रसद आपूर्ति भी सुदृढ़ होगी। यह मार्ग सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिहाज से रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इससे पहले अक्टूबर 2025 में 7.5 किलोमीटर लंबे नागा-टूंग मार्ग को भी खोला गया था, जिसने क्षेत्रीय संपर्क को और मजबूत किया।
विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
उद्घाटन के अवसर पर रक्षा राज्य मंत्री ने कहा कि ये अवसंरचनात्मक परिसंपत्तियां उत्तरी सिक्किम के समग्र विकास और स्थानीय समुदायों के कल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में लगातार कार्य कर रहे बीआरओ के अभियंताओं और कर्मियों की सराहना की।
उन्होंने कहा कि इस तरह की परियोजनाएं न केवल सीमा क्षेत्रों को सुरक्षित बनाती हैं, बल्कि पर्यटन, व्यापार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को भी गति देती हैं। यह पहल सिक्किम सरकार द्वारा प्रतिपादित ‘आत्मनिर्भर सिक्किम-विकसित भारत’ के विजन के अनुरूप है।
सामरिक मजबूती, आपदा प्रबंधन क्षमता और क्षेत्रीय विकास—इन तीनों आयामों को एक साथ आगे बढ़ाने वाली यह परियोजना पूर्वोत्तर में बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।



