पाठ्यपुस्तकों का निर्धारण करना माध्यमिक शिक्षा परिषद का अधिकारः हाईकोर्ट

प्रयागराज (आलोक गुप्ता). इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षाओं के लिए पाठ्यपुस्तकों का निर्धारण करना पूरी तरह से माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश के अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यायालय ने कहा कि इस विषय में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तक तय करना सक्षम प्राधिकारी की वैधानिक शक्ति है।
यह आदेश न्यायमूर्ति नीरज तिवारी और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने मैसर्स राजीव प्रकाशन द्वारा दायर याचिका का निस्तारण करते हुए पारित किया। याचिकाकर्ता ने परिषद के सचिव द्वारा जारी एक आदेश को चुनौती दी थी और उसे निरस्त करने की मांग की थी।
खंडपीठ ने अपने फैसले में वर्ष 2014 में दिए गए एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि समान प्रश्न पर पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा के लिए पाठ्यपुस्तकों का चयन और निर्धारण संबंधित प्राधिकारी की विधिसम्मत शक्ति है। ऐसे में विवादित आदेश में न्यायालय के हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता।
न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि कोई प्रकाशक उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 7, 1979 अथवा अन्य लागू विधिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है तो राज्य सरकार और संबंधित अधिकारी कानून के तहत कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं।
साथ ही कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यदि प्रकाशक किसी अधिनियम या कानून का उल्लंघन नहीं कर रहा है, तो उसे परिषद द्वारा निर्धारित पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें प्रकाशित करने या खुले बाजार में बेचने से नहीं रोका जा सकता। हालांकि, ऐसी पुस्तकों की गुणवत्ता या मूल्य निर्धारण का दायित्व स्वयं प्रकाशक का होगा और उसके व्यावसायिक परिणाम भी उसे ही वहन करने होंगे।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि 15 अप्रैल 2014 के निर्णय का परीक्षण करने के बाद यह स्पष्ट है कि वर्तमान याचिका में उठाया गया प्रश्न उसी दायरे में आता है। तदनुसार, याचिका को पूर्व निर्णय की शर्तों के अनुरूप निस्तारित कर दिया गया।
इस फैसले को शिक्षा व्यवस्था में अधिकारों की स्पष्टता और नियामक ढांचे की पुष्टि के रूप में देखा जा रहा है।
