सहमति से बने रिश्ते को हर हाल में अपराध नहीं ठहराया जा सकता: हाईकोर्ट

प्रयागराज (आलोक गुप्ता). इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि विवाह के वादे के आधार पर आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को स्वतः ही “झूठे विवाह वादे” की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि शुरुआत से धोखाधड़ी की मंशा सिद्ध नहीं होती, तो केवल बाद में विवाह न होने के आधार पर आपराधिक मामला नहीं बनता।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने अलीगढ़ निवासी जितेंद्र पाल और दो अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। मामले में आरोप था कि याची ने विवाह का झांसा देकर युवती से यौन संबंध बनाए, जबकि उसके भाई और भाभी पर धमकी देने के आरोप लगाए गए थे। निचली अदालत में दाखिल चार्जशीट और संज्ञान आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की गई थी।
अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, दोनों पक्ष 2015-16 से परिचित थे और कॉलेज के दौरान उनके बीच प्रेम संबंध विकसित हुए थे। वर्ष 2021 से दोनों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध बने, जो नवंबर 2024 तक चले। जांच में जबरन गर्भपात जैसे गंभीर आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी, जबकि पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।
हाईकोर्ट ने माना कि दोनों पक्ष वयस्क, शिक्षित और लंबे समय तक रिश्ते में रहे। उपलब्ध साक्ष्यों से यह संकेत नहीं मिलता कि विवाह का वादा शुरू से ही छलपूर्वक किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि सहमति से चले लंबे रिश्ते को केवल बाद में विवाह न होने के कारण अपराध नहीं ठहराया जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने चार्जशीट, संज्ञान आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।


