मछलियों का वार्षिक उत्पादन 1.89 मिलियन टनः प्रयागराज में 27 और बनारस में 41% की वृद्धि

नमामि गंगा के तहत वैज्ञानिक हस्तक्षेप से गंगा में देशी मछलियों की वापसी, उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी
नई दिल्ली. बीते एक दशक में गंगा नदी में घटती देशी मछली प्रजातियों को पुनर्जीवित करने के लिए चलाए गए वैज्ञानिक प्रयासों ने ठोस परिणाम देना शुरू कर दिया है। आईसीएआर-केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीआईएफआरआई) ने नमामि गंगा कार्यक्रम के अंतर्गत नदी प्रबंधन का व्यापक मॉडल लागू कर पारिस्थितिक संतुलन बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की है।
गिरावट से पुनरुत्थान की ओर
पिछले दशकों में पर्यावास क्षरण, प्रवाह में बदलाव, प्रदूषण और अनियंत्रित दोहन के कारण गंगा की मूल मछली आबादी प्रभावित हुई थी। 2017 से 2025 के बीच संस्थान ने गंगा और उसकी सहायक नदियों में 169 वैज्ञानिक नदी प्रबंधन कार्यक्रम संचालित किए। इस दौरान 205.5 लाख देशी मछली बीज चयनित स्थलों पर छोड़े गए।
विशेष बात यह रही कि ये बीज सामान्य हैचरी स्रोतों के बजाय गंगा से एकत्रित जंगली प्रजातियों के आनुवंशिक आधार पर विकसित किए गए, ताकि देशी वंश की शुद्धता बनी रहे। 10–15 सेमी लंबाई और 100–120 ग्राम वजन की उन्नत अवस्था की मछलियों को नियंत्रित परिस्थितियों में अनुकूलित कर नदी में छोड़ा गया, जिससे जीवित रहने की दर बेहतर रही।
लक्षित भौगोलिक रणनीति
कार्यक्रम का 68 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम बंगाल में, 17 प्रतिशत बिहार में, 9 प्रतिशत उत्तर प्रदेश में, 5 प्रतिशत झारखंड में और 1 प्रतिशत उत्तराखंड में केंद्रित रहा। निचले बेसिन में उच्च मत्स्य गतिविधि और पारिस्थितिक महत्व को ध्यान में रखते हुए यह वितरण तय किया गया।
उत्पादन में ठोस वृद्धि
प्रारंभिक आकलनों के अनुसार प्रमुख नदी केंद्रों पर भारतीय मेजर कार्प की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। प्रयागराज में 24.7 प्रतिशत और वाराणसी में 41 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। इसे सतत मत्स्य संवर्धन और संरक्षण उपायों का परिणाम माना जा रहा है।
संस्थान के प्रयासों से भारत अंतर्देशीय जल में पकड़ी जाने वाली मछलियों का विश्व का शीर्ष उत्पादक बना है, जहां वार्षिक उत्पादन 1.89 मिलियन टन तक पहुंचा है। महानदी (15,134 टन) और कृष्णा (18,902 टन) जैसी प्रमुख नदियों में वार्षिक मत्स्य आकलन भी पहली बार वैज्ञानिक ढंग से किया गया।

हिल्सा पुनर्स्थापन में उपलब्धि
2025 में हुगली मुहाना से संकलित क्रायोप्रिजर्व्ड स्पर्म और ब्रूड मादाओं के आधार पर हिल्सा के कृत्रिम प्रजनन की तकनीक विकसित की गई। 3.82 लाख वयस्क हिल्सा को फरक्का बैराज के ऊपरी हिस्से में छोड़ा गया, जिनमें 6,031 टैग की गईं। इसके अतिरिक्त 54.91 लाख निषेचित अंडे और 8.06 लाख स्पॉन भी नदी में प्रवाहित किए गए।
जलाशय और आर्द्रभूमि में क्रांति
जलाशय मत्स्य प्रबंधन दिशानिर्देशों से औसत उत्पादकता 20 से बढ़कर 150 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष हो गई, जबकि आर्द्रभूमि उत्पादकता 600 से बढ़कर 1,600 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष पहुंची। इन उपलब्धियों के आधार पर 2025 में राष्ट्रीय जलाशय मत्स्य पालन प्रबंधन नीति दिशानिर्देश तैयार किए गए।
प्रौद्योगिकी और नवाचार
संस्थान ने केज फार्मिंग की उन्नत तकनीकें विकसित कर व्यावसायीकरण किया है, जिनमें उच्च मूल्य प्रजातियों का पालन संभव हुआ है। प्रति 96 वर्गमीटर केज से औसतन 3–4 मीट्रिक टन उत्पादन प्राप्त हो रहा है। संतुलित फिश फीड, स्वास्थ्य देखभाल उत्पाद और आईओटी आधारित जल गुणवत्ता निगरानी प्रणाली भी विकसित की गई हैं।
भारतीय अंतर्देशीय मत्स्य पालन सूचना विज्ञान (आईएनएनएफ) के माध्यम से मशीन लर्निंग और जियोस्पेशियल एनालिटिक्स आधारित वेब-जीआईएस पोर्टल विकसित किया गया है, जो राष्ट्रीय स्तर पर मत्स्य डेटा का एकीकृत विश्लेषण उपलब्ध कराता है।


संस्थागत विरासत
मार्च 1947 में बैरकपुर (पश्चिम बंगाल) में स्थापित यह संस्थान उत्पादन-उन्मुख अनुसंधान से आगे बढ़कर इकोसिस्टम-आधारित प्रबंधन मॉडल की ओर अग्रसर हुआ है, जिसमें संरक्षण, आजीविका और पोषण सुरक्षा का एकीकरण किया गया है।
आगे की राह
विशेषज्ञों के अनुसार, वैज्ञानिक निगरानी और दीर्घकालिक प्रबंधन के साथ नदी पुनर्जीवन केवल अवधारणा नहीं, बल्कि व्यवहारिक वास्तविकता बन सकता है। चुनौती अब इन पहलों की निरंतरता, विस्तार और हितधारकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने की है, ताकि गंगा की जैव विविधता और मत्स्य संसाधन दीर्घकाल तक सुरक्षित रह सकें।
एक नजर में मछली उत्पादन प्रोग्रा:
- 2017 से 2025 के बीच 169 नदी प्रबंधन कार्यक्रम चलाए गए।
- इस दौरान 205.5 लाख देशी मछलियों के बीज गंगा और उसकी सहायक नदियों में छोड़े गए।
- यह काम आईसीएआर-केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान ने नमामि गंगा कार्यक्रम के तहत किया।
- प्रयागराज में मछली उत्पादन में 24.7% बढ़ोतरी हुई।
- वाराणसी में मछली उत्पादन 41% बढ़ा।
- महानदी में सालाना 15,134 टन और कृष्णा नदी में 18,902 टन मछली पकड़ का अनुमान लगाया गया।
- मछली पालन गंगा और उसकी सहायक नदियों के महत्वपूर्ण इलाकों में किया गया।
- देशी मछली प्रजातियों को बचाने और नदी में संतुलन बनाए रखने पर खास ध्यान दिया गया।
- लक्ष्य है टिकाऊ (सस्टेनेबल) और वैज्ञानिक तरीके से नदी मत्स्य पालन को बढ़ावा देना।