
The live ink desk. मृत्युदंड के क्रियान्वयन के तरीके को लेकर उठे संवैधानिक सवालों पर उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने इस मामले में सभी पक्षकारों को दो सप्ताह के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है।
यह याचिका अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर की गई है, जिसमें फांसी के माध्यम से दी जाने वाली मौत की सजा को अमानवीय और अत्यधिक पीड़ादायक बताया गया है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वर्तमान व्यवस्था आधुनिक मानवाधिकार मानकों के अनुरूप नहीं है और इसकी जगह कम पीड़ा देने वाले विकल्पों, जैसे जहरीले इंजेक्शन के माध्यम से मृत्युदंड, पर विचार किया जाना चाहिए।
पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत को अवगत कराया था कि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है और इसके लिए एक विशेष समिति का गठन किया गया है, जो विभिन्न पहलुओं का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट देगी।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि विधि आयोग अपनी पूर्व रिपोर्टों में संकेत दे चुका है कि कई विकसित और विकासशील देशों ने फांसी के बजाय गोली मारने, बिजली के करंट या गैस चैंबर जैसे वैकल्पिक तरीकों को अपनाया है। वर्ष 1967 की 35वीं विधि आयोग रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि सजा का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि न्याय होना चाहिए, जिसमें अनावश्यक पीड़ा से बचा जाना आवश्यक है।
याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354(5), जिसमें मृत्युदंड के लिए ‘मौत होने तक लटकाए जाने’ का प्रावधान है, को संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन के अधिकार के विपरीत बताते हुए चुनौती दी गई है। साथ ही सम्मानजनक तरीके से मृत्यु को भी मौलिक अधिकार के दायरे में मान्यता देने की मांग की गई है।
अब इस संवेदनशील और दूरगामी प्रभाव वाले मुद्दे पर देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले का इंतजार किया जा रहा है, जो मृत्युदंड की प्रक्रिया से जुड़े कानूनों की दिशा और दशा तय कर सकता है।

