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खामोश हुई मासूम की हंसीः आयुष की हत्या ने बरगढ़वासियों को रुलाया

प्रयागराज/चित्रकूट (आलोक गुप्ता). बरगढ़ कस्बे की गलियों में अब भी सन्नाटा पसरा है। जहां कल तक 13 वर्षीय आयुष केसरवानी की हंसी गूंजती थीं, वहां आज मातम और आंसुओं का सैलाब है। अपहरण के बाद बेरहमी से की गई मासूम की हत्या ने पूरे इलाके की आत्मा को झकझोर दिया है।

गुरुवार की शाम आयुष रोज़ की तरह घर के बाहर खेल रहा था। किसी को अंदेशा भी नहीं था कि यह उसकी मां से आख़िरी मुस्कान और पिता से आख़िरी बातचीत होगी। कुछ ही घंटों में एक हंसता-खेलता बच्चा फिरौती की साजिश का शिकार बन जाएगा, और उसकी सांसें बक्से में कैद कर दी जाएंगी।

जब पुलिस ने इरफान के घर से बक्से में बंद आयुष का शव बरामद किया, तो दृश्य देखकर हर आंख नम हो गई। बेटे की हालत देखकर माता-पिता बदहवास हो गए। मां की चीखें दिल चीर देने वाली थीं, जबकि पिता अशोक केसरवानी सदमे में मौन खड़े रह गए। घर के बाहर सैकड़ों लोग जमा थे, लेकिन कोई किसी को ढांढस देने की स्थिति में नहीं था।

शुक्रवार सुबह पुलिस मुठभेड़ में एक आरोपी के मारे जाने और दूसरे के घायल होने की खबर आई, लेकिन इससे परिवार का दर्द कम नहीं हुआ। आयुष की खाली पड़ी साइकिल, उसके जूते और स्कूल की किताबें अब परिवार को हर पल उस मासूम की याद दिला रही हैं, जो लौटकर नहीं आएगा।

क्या अब घर के बाहर बच्चे सुरक्षित नहीं!

इस घटना ने पूरे कस्बे को भीतर तक हिला दिया है। अभिभावकों के मन में भय घर कर गया है। लोग पूछ रहे हैं—क्या अब बच्चे घर के बाहर भी सुरक्षित नहीं हैं? क्या भरोसे की दुनिया इतनी क्रूर हो गई है कि मासूमियत को भी नहीं छोड़ा जा रहा?

बरगढ़ में शोक, आक्रोश और असहायता का माहौल है। हर कोई यही कह रहा है कि आयुष की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी है। मासूमों की सुरक्षा को लेकर अब केवल संवेदनाएं नहीं, ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है।

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