मौतों के लिए बिजली विभाग की लापरवाही सिद्ध करने की बाध्यता नहीं

प्रयागराज (आलोक गुप्ता). इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने करंट (electrocution) से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा है कि बिजली आपूर्ति से होने वाली दुर्घटनाओं में बिजली विभाग की सख्त जिम्मेदारी (strict liability) स्वतः तय होती है। ऐसे मामलों में पीड़ित को मुआवजा पाने के लिए विभागीय लापरवाही (negligence) सिद्ध करने की बाध्यता नहीं है।
Allahabad HighCourt के न्यायमूर्ति संदीप जैन की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा दायर प्रथम अपील को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि वादी (claimant) को केवल यह साबित करना होता है कि उसे विद्युत करंट से चोट लगी है। लाइन के रख-रखाव में चूक या कर्मचारियों की लापरवाही साबित करना आवश्यक नहीं है।
पीड़ित की मौजूदा स्थिति
मामला एक मजदूर मोहम्मद निसार उर्फ बड़े लाला से जुड़ा है, जो उस समय गंभीर रूप से घायल हो गया जब एक जिंदा हाई वोल्टेज तार उसके ऊपर गिर गया। इस हादसे के चलते उसे गैंगरीन हो गया और अंततः उसका एक हाथ काटना पड़ा। पीड़ित ने 65% स्थायी दिव्यांगता (permanent disability) का दावा करते हुए लगभग 6.80 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी।
ट्रायल कोर्ट का फैसला
पीलीभीत के एडीजे (Additional District Judge) ने साक्ष्यों के आधार पर माना कि दुर्घटना जिंदा तार गिरने से हुई और पीड़ित की आय लगभग 200 रुपये प्रतिदिन थी। कोर्ट ने 4 लाख रुपये मुआवजा (compensation) तथा 5% वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया।
निगम की दलीलें खारिज
अपील में उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड ने तर्क दिया कि..
- घटना को सिद्ध करने का भार वादी पर है
- हाईटेंशन लाइन टूटने पर बिजली स्वतः ट्रिप (trip) हो जाती है
- पर्याप्त मेडिकल दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए
- मुआवजा अत्यधिक है
हालांकि हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि विद्युत आपूर्ति जैसी खतरनाक गतिविधियों में strict liability principle लागू होता है।
मुआवजे पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में मुआवजा तय करने का तरीका मोटर दुर्घटना (motor accident claims) जैसा होना चाहिए, जिसमें निम्न कारकों को शामिल किया जाता है:
- आय (income assessment)
- चोट की गंभीरता (injury severity)
- स्थायी दिव्यांगता (permanent disability)
- भविष्य की आय में कमी (loss of future earning)
- इलाज का खर्च (medical expenses)
- शारीरिक व मानसिक पीड़ा (pain & suffering)
अदालत ने यह भी माना कि पीड़ित की कार्यात्मक दिव्यांगता (functional disability) 100% तक आंकी जा सकती थी, लेकिन चूंकि उसने ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती नहीं दी, इसलिए अतिरिक्त राहत नहीं दी जा सकती।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए बिजली निगम की अपील खारिज कर दी और उस पर जुर्माना भी लगाया। कोर्ट ने दोहराया कि ऐसे मामलों में विभाग की जवाबदेही (accountability) स्वतः स्थापित होती है।

