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जल में खड़े होकर उगते हुए सूर्य को दिया अर्घ्य

प्रयागराज (आलोक गुप्ता). सोमवार को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही महापर्व छठ का समापन हो गया। रात के दूसरे पहर से ही जनपद के विभिन्न घाटों पर व्रती महिलाओं का सपरिवार पहुंचना शुरू हो गया था। पूजन सामग्री के साथ घाट पर व्रती महिलाओं ने पूरे विधि-विधान से सूर्य देवताऔर छठी मइया की आराधना की और कुशलता की कामना की। इसके पश्चात जैसे ही आसमान में लालिमा दिखी, उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया। जल में खड़े होकर दूध और जल से अर्घ्य देने के उपरांत पूरे परिवार ने छठी मइया का जयकारा लगाया और व्रत का समापन किया।

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छठ पूजा के आयोजन के लिए जिला प्रशासन की तरफ से संगम, बलुआघाट, गऊघाट, अरैल, नैनी, मेजा, कोरांव, शिवकुटी, रसूलाबाद, फाफामऊ एवं क्षेत्रीय स्तर पर बहने वाली नदियों में नहरों में पूजन किया गया। व्रती महिलाओं ने जल में खड़े होकर उगते हुए भगवान भाष्कर को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया।

संगम, अरैल के साथ-साथ बलुआघाट बारादरी पर होने वाले डाला छठ पूजन को लेकर विशेष इंतजामात किए गए थे। पुलिस के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी भी हर व्यवस्था की लगातार मानीटरिंग कर रहे थे। आईजी डा. राकेश सिंह और एसएसपी शैलेष कुमार पांडेय भी पूरी टीम के साथ रात से सुबह पूजा समाप्त होने तक संगम क्षेत्र में डटे रहे।

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मान्यता है कि महाभारत काल से छठ पूजा का आयोजन किया जा रहा है। सूर्य़ को अर्घ्य देने से कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत होती है। छठ पूजा के अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है। इस दौरान पूरा परिवार घाट पर जुटता है और भगवान भाष्कर और छठी मइया की आराधना करता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार छठ महापर्व की शुरुआत महाभारत काल से मानी जाती है।

भगवान सूर्यदेव की कृपा से कुंती को कर्ण नाम का तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ था। कर्ण हर रोज जल में कमर तक खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य दिया करते थे। मान्यता है कि कमर तक जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा वहीं से शुरू हुई। छठ पूजा के दौरान व्रती षष्ठी और सप्तमी तिथि को व्रतीकमर तकजल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं।

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