
The live ink desk. रामेश्वरम को मुख्य भूमि से जोड़ने वाले नए पाम्बन रेल पुल के चालू हो जाने के बाद अब सौ वर्षों से अधिक पुराने पाम्बन रेल पुल को हटाने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं। रेलवे प्रशासन ने अगले चार महीनों के भीतर पुराने पुल को चरणबद्ध तरीके से हटाने का लक्ष्य तय किया है, जिसके लिए तैयारियां तेज़ कर दी गई हैं।
तमिलनाडु के मंडपम और रामेश्वरम द्वीप के बीच संपर्क स्थापित करने में दशकों तक पाम्बन रेल पुल और इंदिरा गांधी सड़क पुल ने अहम भूमिका निभाई। वर्ष 1914 में निर्मित पाम्बन रेल पुल, जिसे शेर्ज़र्स ब्रिज के नाम से भी जाना जाता है, समुद्र के बीच बना देश का पहला रेल पुल था और इसे भारतीय इंजीनियरिंग की एक अनूठी उपलब्धि माना जाता है।
जहाज़ों की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए पुल के मध्य भाग में लिफ्ट ब्रिज की व्यवस्था की गई थी, जो उस समय तकनीकी दृष्टि से अत्यंत विशेष थी। वर्ष 1964 में आए भीषण चक्रवात से पुल को भारी क्षति पहुँची थी, जिसके बाद इसके पुनर्निर्माण के पश्चात रेल यातायात दोबारा शुरू किया गया।
111 बरस तक लगातार दी सेवा
लगभग 111 वर्षों तक सेवा देने के बाद पुल में बार-बार तकनीकी खामियाँ सामने आने लगीं। इन्हीं कारणों से वर्ष 2019 में नए पाम्बन रेल पुल की आधारशिला रखी गई और 2020 से निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। पाँच वर्षों के निर्माण के बाद 6 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नए पुल का उद्घाटन किया, जिससे आधुनिक रेल आवागमन संभव हो सका।
2.3 किमी लंबा है पाम्बन पुल
अब रेलवे विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) ने पुराने पुल को हटाने की जिम्मेदारी संभाली है। अगस्त में 2.3 किलोमीटर लंबे इस पुल के मध्य स्थित लिफ्ट ब्रिज, गर्डर संरचना और रेल पटरियों को हटाने के लिए 2.53 करोड़ रुपये की लागत से निविदा जारी की गई थी। निविदा प्रक्रिया पूरी होने के बाद भूमि पूजन के साथ कार्य की औपचारिक शुरुआत कर दी गई है।
रेलवे संग्रहालय की बढ़ेगी शोभा
पुल के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इसे तोड़ने के बजाय सावधानीपूर्वक चरणों में काटकर हटाने की योजना बनाई गई है। इसके लिए पुल के विभिन्न हिस्सों पर क्रम संख्या अंकित की गई है, ताकि संरचना को क्षति पहुँचाए बिना अलग किया जा सके। अगले माह से कर्मचारियों द्वारा यह कार्य प्रारंभ किया जाएगा।
रेलवे प्रशासन की योजना के अनुसार, समुद्र से निकाले जाने के बाद 111 वर्ष पुराने ऐतिहासिक पाम्बन लिफ्ट ब्रिज को संरक्षित कर रेलवे संग्रहालय में रखा जाएगा, ताकि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भारतीय रेलवे के गौरवशाली इतिहास का साक्षी बना रहे।


