एक देश-एक शिक्षा बोर्डः क्या समय आ गया है?

भारत में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिन-ब-दिन महंगी होती जा रही है। आम और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना अब चुनौती बनता जा रहा है। यही वजह है कि कई परिवार अपनी पारिवारिक योजनाओं को भी शिक्षा के बढ़ते खर्च के अनुसार सीमित करने लगे हैं। शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकता यदि आर्थिक बोझ में बदल जाए, तो यह किसी भी समाज के लिए चिंताजनक संकेत है।
वर्तमान में देश की शिक्षा व्यवस्था बहु-स्तरीय और विविध बोर्डों में विभाजित है। अलग-अलग राज्यों के अपने-अपने पाठ्यक्रम, परीक्षाएं और मूल्यांकन पद्धतियां हैं। इसके कारण न केवल विद्यार्थियों को प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में असमानता का सामना करना पड़ता है, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के समय भी कई बार पात्रता संबंधी जटिलताएं उत्पन्न होती हैं। जबकि दूसरी ओर मेडिकल के लिए NEET और इंजीनियरिंग के लिए JEE जैसी राष्ट्रीय परीक्षाओं ने यह साबित किया है कि एक समान परीक्षा प्रणाली पूरे देश में सफलतापूर्वक लागू की जा सकती है।
ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब देश में एक आधार कार्ड, एक मतदाता पहचान पत्र, एक पैन और एक जीएसटी व्यवस्था संभव है, तो क्या “एक देश, एक शिक्षा बोर्ड” पर गंभीरता से विचार नहीं होना चाहिए? यदि पूरे भारत में हाईस्कूल और इंटरमीडिएट स्तर पर एक समान बोर्ड—जैसे प्रस्तावित “इंडियन एजुकेशन बोर्ड”—लागू किया जाए, तो पाठ्यक्रम की विसंगतियां काफी हद तक समाप्त हो सकती हैं।
इसका एक बड़ा सामाजिक लाभ भी होगा। आज निजी विद्यालयों में हर वर्ष पाठ्यक्रम और किताबें बदलने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जिससे अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता है। एक ही परिवार में बड़े भाई-बहन की किताबें छोटे बच्चों के काम नहीं आ पातीं। यदि पाठ्यक्रम में स्थिरता लाई जाए और अनावश्यक बदलावों पर रोक लगे, तो न केवल परिवारों की बचत होगी बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान मिलेगा, क्योंकि हर वर्ष नई किताबों की छपाई के लिए पेड़ों की कटाई भी कम होगी।
हालांकि, इस विचार के साथ कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में राज्यों की भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विशेषताओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए यदि “एक देश, एक बोर्ड” की दिशा में कदम बढ़ाया जाए, तो उसमें राष्ट्रीय समानता के साथ-साथ क्षेत्रीय लचीलापन (regional flexibility) भी सुनिश्चित करना होगा।
स्पष्ट है कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता है—चाहे वह फीस नियंत्रण हो, पाठ्यक्रम की स्थिरता हो या मूल्यांकन की समानता। नीति-निर्माताओं को इस दिशा में संतुलित, दूरदर्शी और जनहितकारी निर्णय लेने की आवश्यकता है, ताकि शिक्षा वास्तव में समान अवसर का माध्यम बन सके, न कि आर्थिक विभाजन का कारण।
अब समय आ गया है कि शिक्षा को खर्च नहीं, निवेश माना जाए—और ऐसा ढांचा तैयार किया जाए जिसमें देश का हर बच्चा, चाहे वह किसी भी वर्ग या क्षेत्र से हो, समान गुणवत्ता की शिक्षा प्राप्त कर सके।
लेखकः स्वतंत्र रावत। सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखते हैं। लेखन में रुचि। जिला उपभोक्ता आयोग, भदोही में रीडर के पद पर कार्यरत हैं।



