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करवा चौथ से भी कठिन है हरितालिका तीज का व्रत

महादेव को पति के रुप में पाने के लिए माता पार्वती ने रखा था हरितालिका तीज का व्रत

आचार्य वीरेंद्र मिश्र. हरितालिका व्रत को हरतालिका तीज या फिर तीजा भी कहा जाता है। यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्‍ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। हरितालिका तीज का व्रत या त्योहार मंगलवार यानी 30 अगस्त को है।  इस दिन कुंवारी कन्‍यााएं और सुहागिन महिलाएं भगवान शंकर और माता पार्वती की सच्‍चे मन से पूजा करती हैं। यह व्रत  करवाचौथ से भी कठिन माना जाता है, क्योंकि जहां करवाचौथ में चांद देखने के बाद व्रत तोड़ दिया जाता है, वहीं इस व्रत में पूरे दिन निर्जला व्रत किया जाता है और अगले दिन पूजन के पश्चात ही व्रत तोड़ा जाता है।

हरतालिका तीज का व्रत सौभाग्‍यवती महिलाएं अपने सुहाग को अखंड बनाए रखने और अविवाहित युवतियां अपने इच्छित वर को पाने के लिए रखती हैं। सबसे पहले यह व्रत माता पार्वती ने सबसे भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्‍त करने के लिए रखा था। उन्‍हीं का अनुसरण करते हुए महिलाएं, माता पार्वती और शिवजी जैसा दांपत्‍य जीवन पाने के लिए य‍ह व्रत करती हैं।

इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और स्नान के उपरांत पूरा श्रृंगार करती हैं। पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरी−शंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके साथ पार्वती को सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। रात में भजन, कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है और शिव-पार्वती विवाह की कथा सुनी जाती है। हरितालिका तीज व्रत के नियम के बारे में उन्होंने बताया कि हरतालिका तीज व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है। कई जगहों पर महिलाएं भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीगणेश की कच्ची मूर्ति से प्रतिमा बनाती हैं।

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यह व्रत निर्जला और निराहार रखा जाता है। इस व्रत में अन्न और जल ग्रहण करना मना होता है। व्रत का पारण अगले दिन यानी चतुर्थी तिथि में किया जाता है। व्रत रखने वाली महिलाओं को हरतालिका तीज व्रत कथा जरूर सुननी चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार हरतालिका तीज व्रत शुरू करने के बाद जीवन भर इस व्रत को नियमित रूप से रखना चाहिए। इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती को रेशमी वस्त्र अर्पित करना शुभ माना जाता है। हरितालिका तीज व्रत की पूजा प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद सबसे शुभ मानी जाती है। इस व्रत को करने से सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य के साथ सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

चतुर्थी को भूलकर भी न करें चंद्रदर्शनः चंद्रमा को शीतलता प्रदान करने का स्वामी माना जाता है। माना जाता है कि जहां सूर्य गर्मी के ताप को बढ़ाते हैं, वहीं चंद्रदेव गर्मी के ताप को शांत कर शीतलता प्रदान करते हैं, लेकिन पूरे वर्ष में एक समय ऐसा होता है कि उस समय चंद्रमा को अगर कोई भूल से भी देख ले तो उसे पूरे वर्ष कलंक मिलना तय है। भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्थी का चंद्रमा कलंकित होता है। यदि इस दिन भूल से भी किसी को चंद्रदर्शन हो गया तो उसे कलंक का शिकार होना ही पड़ेगा।

चंद्रदेव को कलंकित होने का श्राप प्रथम पूज्य भगवान गणेश भगवान ने दिया था। कलंक के दोष का परिहार बताते हुए उन्होंने बताया कि यदि किसी को अनजान में भाद्रपद की चतुर्थी को चंद्रमा का दर्शन हो जाता है तो उसे श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित स्यमन्तक मणि की कथा को पढ़ना चाहिए। इस कथा को पढ़ने से चंद्रदर्शन के कलंक का प्रभाव समाप्त हो जाता है।

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