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रवि किरण जैन स्मृति व्याख्यान में लोकतंत्र पर मंथन

आखिर हम क्या करें’ विषय पर अभय दुबे का व्याख्यान, आशुतोष ने की अध्यक्षता

प्रयागराज (आलोक गुप्ता). नागरिक समाज और लोहिया विचार मंच के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को रवि किरण जैन स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। ‘आखिर हम क्या करें’ विषय पर केंद्रित इस कार्यक्रम में देश की मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों और लोकतंत्र की चुनौतियों पर गंभीर विमर्श हुआ। मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे और अध्यक्षीय भाषण में चर्चित पत्रकार आशुतोष ने अपने विचार रखे।

कार्यक्रम में इलाहाबाद के वरिष्ठ सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का सम्मान किया गया। सम्मानित होने वालों में कामरेड हरिश्चंद्र द्विवेदी, कामरेड नसीम अंसारी, कामरेड गायत्री गांगुली, कुमुदिनी पति और सर्वोदय के राम धीरज शामिल रहे।

स्वागत भाषण में श्रद्धांजलि और समकालीन संदर्भ

कार्यक्रम का संचालन नागरिक समाज और अधिवक्ता मंच से जुड़े राजवेंद्र सिंह ने किया। धन्यवाद ज्ञापन लोहिया विचार मंच के संयोजक विनय कुमार सिन्हा ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, अधिवक्ता, पत्रकार और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।

आयोजन की शुरुआत नागरिक समाज के वरिष्ठ सदस्य डॉ. आशीष मित्तल के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने रवि किरण जैन को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए देश में कॉरपोरेट पूंजी के सहारे आगे बढ़ रही नीतियों पर चिंता जताई और उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए घातक बताया।

अभय दुबे: बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र के लिए खतरा

मुख्य वक्ता अभय दुबे ने कहा कि भारत की वर्तमान स्थिति के लिए बहुसंख्यकवादी राजनीति जिम्मेदार है। उनके अनुसार हिंदू बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र पर हावी होता जा रहा है, जो बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल ने शुरुआत से ही लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया और कॉरपोरेट गठजोड़ के जरिए पूंजीपतियों के हित में नीतियां बनाईं।

उन्होंने चुनावी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि एसआईआर (SIR) जैसे उपायों के जरिए चुनावी परिणामों को प्रभावित किया गया। अभय दुबे ने यह भी कहा कि अघोषित रूप से लोकतंत्र पर कब्जे की स्थिति बन चुकी है, हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि तमाम प्रयासों के बावजूद सत्तारूढ़ दल का वोट प्रतिशत एक सीमा से आगे नहीं बढ़ सका, जो उम्मीद की एक किरण है। मीडिया और न्यायपालिका में भी बहुसंख्यकवादी प्रभाव की चर्चा करते हुए उन्होंने चिंता जताई।

ईवीएम और चुनावी गोपनीयता पर सवाल

अभय दुबे ने ईवीएम प्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इससे मतदान की गोपनीयता प्रभावित हुई है। उनके अनुसार एसआईआर के दौर तक यह आकलन संभव हो गया था कि किस बूथ पर कितने वोट कम-ज्यादा होंगे, जो लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती है।

उन्होंने निराशा से बचने की अपील करते हुए लोहिया जी के विचारों का हवाला दिया और कहा कि निराशा के भी कर्तव्य होते हैं। राजनीति और सामाजिक प्रक्रियाएं स्वयं विकसित होती हैं और नए विकल्प प्रस्तुत करती हैं।

आशुतोष: सवाल उठाते रहना ही लोकतंत्र की ताकत

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने कहा कि आज संसद और जनता को चुनने का अधिकार सीमित होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि हमें सपने देखना नहीं छोड़ना चाहिए और अपने घर-समाज में भी भगत सिंह जैसे विचारों की जरूरत है। विपक्ष को तय करना होगा कि उसका लक्ष्य सत्ता है या देश को बचाना।

उन्होंने चेतावनी दी कि आजादी की स्मृतियों को मिटाने की कोशिशें हो रही हैं और ऐसे समय में लगातार सवाल उठाना ही नागरिकों का दायित्व है। अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि तमाम चुनौतियों के बावजूद इलाहाबाद आज भी जीवंत विचारों का शहर है।

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