संघर्ष, निर्वासन और वापसी: सत्ता के शिखर पर तारिक रहमान का सफर

The live ink desk. बांग्लादेश की राजनीति में लंबे अंतराल के बाद निर्णायक वापसी करने वाले तारिक रहमान आज वैश्विक सुर्खियों में हैं। 13वें संसदीय चुनाव में उनकी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की बड़ी जीत ने उन्हें सत्ता के केंद्र में ला खड़ा किया है। यह उभार एक दिन का नहीं, बल्कि उतार-चढ़ाव, आरोपों, जेल और लंबे निर्वासन से गुजरकर बना है।
राजनीति तारिक रहमान को विरासत में मिली। उनके पिता जिया-उर-रहमान देश के राष्ट्रपति रहे, जबकि उनकी मां खालिदा जिया दो बार प्रधानमंत्री रहीं। 1990 के दशक में सक्रिय राजनीति में आए तारिक, 2001–06 के दौरान बीएनपी सरकार में बेहद प्रभावशाली नेता के रूप में उभरे। उसी दौर में उन्हें पार्टी की ‘स्ट्रॉन्ग आर्म’ माना जाने लगा।
2007 में सैन्य समर्थित अंतरिम सरकार के दौरान उनके खिलाफ भ्रष्टाचार और अन्य मामलों में कार्रवाई हुई। जेल और बाद में इलाज के बहाने लंदन प्रवास ने उनकी राजनीति को देश से दूर कर दिया, लेकिन पार्टी संचालन विदेश से चलता रहा। 2018 और 2021 में आए दोषसिद्धि के फैसलों ने उनकी वापसी लगभग असंभव कर दी।
राजनीतिक परिदृश्य 2024 में बदला। सत्ता परिवर्तन के बाद अदालतों ने पुराने कई फैसलों को पलटा, जिससे करीब 17 वर्षों बाद तारिक रहमान की स्वदेश वापसी का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसी साल जनवरी में वे परिवार सहित लौटे और महज कुछ दिनों बाद मां खालिदा जिया के निधन ने उन्हें पार्टी की कमान संभालने को विवश कर दिया।
निजी जीवन में भी उनका परिवार प्रभावशाली रहा है। पत्नी जुबैदा रहमान चिकित्सक हैं और उच्च शिक्षा के लिए लंदन में रहीं। बेटी जायमा कानून की पढ़ाई कर चुकी हैं और नई पीढ़ी के राजनीतिक चेहरे के रूप में देखी जा रही हैं।
आज, चुनावी जीत के साथ तारिक रहमान न केवल बीएनपी के निर्विवाद नेता बनकर उभरे हैं, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत भी दे रहे हैं—जहां विरासत, संघर्ष और समय की करवट ने उन्हें सत्ता के दरवाजे तक पहुंचा दिया है।



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