
The live ink desk. पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब वैश्विक समुद्री व्यापार पर गंभीर रूप से दिखने लगा है। रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास करीब 1,900 व्यापारिक जहाज फंस गए हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय तेल और माल आपूर्ति प्रणाली पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद से इस अहम जलमार्ग पर आवाजाही लगभग ठप हो गई है और गुजरने की प्रतीक्षा में जहाज समुद्र में लंगर डाले खड़े हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स और रियल-टाइम ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म ‘मरीन ट्रैफिक’ के आंकड़ों के अनुसार, 20 से 22 मार्च के बीच इस क्षेत्र में (Strait of Hormuz) सैकड़ों जहाज आगे बढ़ने में असमर्थ रहे। इनमें बड़ी संख्या में तेल और गैस से जुड़े टैंकर शामिल हैं—करीब 324 बल्क कैरियर, 315 केमिकल टैंकर, 267 पेट्रोलियम उत्पाद वाहक और 211 कच्चे तेल के टैंकर इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं। विश्लेषण के मुताबिक, दुनिया के कुल टैंकर बेड़े का लगभग 5.5 फीसदी और कंटेनर व ड्राई कार्गो बेड़े का करीब 1.5 फीसदी हिस्सा फिलहाल फारस की खाड़ी में अटका हुआ है।
एनालिटिक्स फर्म ‘वॉर्टेक्सा’ के अनुसार, फंसे हुए जहाजों में करीब 190 मिलियन बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद लदे हैं। इसके अलावा कंटेनर जहाज, एलपीजी कैरियर और भारी-भरकम मालवाहक पोत भी इस जाम का हिस्सा बने हुए हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि कई अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों को अपने जहाजों का संचालन रोकना पड़ा है, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ गया है।
समुद्री विशेषज्ञों का मानना है कि इस गतिरोध का सीधा असर माल ढुलाई दरों और ऊर्जा कीमतों पर पड़ेगा। ‘बाल्टिक डर्टी टैंकर इंडेक्स’ में करीब 49 फीसदी और ‘बाल्टिक क्लीन टैंकर इंडेक्स’ में 78 फीसदी तक की वृद्धि दर्ज की गई है, जो बढ़ती लागत और जोखिम को दर्शाती है। सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के कुल समुद्री तेल निर्यात का लगभग 30 फीसदी इसी मार्ग से गुजरता है, ऐसे में लंबे समय तक बाधा रहने पर वैश्विक बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है।
इसी बीच ईरान ने संकेत दिया है कि जो देश उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई में शामिल नहीं हैं, उनके जहाजों को सुरक्षा मानकों के पालन के साथ गुजरने की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि मौजूदा तनाव और अनिश्चितता के चलते शिपिंग कंपनियां जोखिम लेने से बच रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई, तो इसका व्यापक असर ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार लागत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है।



