
The live ink desk. भारत की अर्थव्यवस्था में सोने की भूमिका लगातार चर्चा का विषय रही है, लेकिन अब यह केवल सांस्कृतिक संपत्ति नहीं बल्कि एक विशाल आर्थिक संसाधन के रूप में उभर रहा है। उद्योग संगठन एसोचैम (ASSOCHAM) की हालिया रिपोर्ट ने इस तथ्य को रेखांकित करते हुए एक रिपोर्ट पेश की है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने का भंडार दुनिया के शीर्ष 10 देशों के आधिकारिक गोल्ड रिजर्व से भी अधिक है। यह संकेत देता है कि देश के भीतर बड़ी मात्रा में पूंजी निष्क्रिय रूप में पड़ी है, जिसे यदि व्यवस्थित रूप से अर्थतंत्र में शामिल किया जाए, तो यह विकास का मजबूत आधार बन सकती है।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के पास करीब 880 टन सोना है, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर शीर्ष गोल्ड रिजर्व रखने वाले देशों में शामिल है। हालांकि, एसोचैम (ASSOCHAM) का अनुमान है कि भारतीय घरों में निजी तौर पर रखा गया सोना मूल्य के हिसाब से करीब 5 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचता है।
यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि अमेरिका और चीन को छोड़कर दुनिया की अधिकांश अर्थव्यवस्थाओं के वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से भी अधिक बैठता है, जो इसकी आर्थिक क्षमता को दर्शाता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में सोना मुख्यतः भौतिक रूप—जैसे आभूषण, सिक्के और बिस्किट—के रूप में संग्रहित किया जाता है, जिससे यह वित्तीय प्रणाली से बाहर रहता है। परिणामस्वरूप, इतनी बड़ी संपत्ति का प्रत्यक्ष उपयोग उत्पादन, निवेश या बुनियादी ढांचे के विकास में नहीं हो पाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस सोने को औपचारिक वित्तीय ढांचे में शामिल किया जाए, तो यह देश की पूंजी उपलब्धता को कई गुना बढ़ा सकता है।
एसोचैम ने अपने विश्लेषण में बताया है कि यदि घरेलू सोना भंडार का मात्र 2% हिस्सा प्रतिवर्ष वित्तीय माध्यमों—जैसे गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम, गोल्ड लोन या गोल्ड-आधारित निवेश उत्पादों—के जरिए अर्थव्यवस्था में लाया जाए, तो वर्ष 2047 तक भारत की जीडीपी में करीब 7.5 लाख करोड़ डॉलर का अतिरिक्त योगदान संभव है।
वर्तमान अनुमानों के अनुसार 2047 तक भारत की जीडीपी लगभग 34 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकती है, लेकिन इस अतिरिक्त योगदान के साथ यह आंकड़ा 40 लाख करोड़ डॉलर के पार जा सकता है।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सोने को औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाने से बैंकिंग क्षेत्र को अतिरिक्त तरलता (liquidity) मिलेगी, जिससे ऋण वितरण क्षमता बढ़ेगी। इससे मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, एमएसएमई और कृषि जैसे क्षेत्रों को सस्ती दरों पर पूंजी उपलब्ध हो सकेगी। साथ ही, इससे देश की आयात निर्भरता भी कम हो सकती है, क्योंकि भारत हर साल बड़ी मात्रा में सोने का आयात करता है, जिससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) प्रभावित होता है।
ASSOCHAM की रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि सरकार को गोल्ड मोनेटाइजेशन योजनाओं को अधिक आकर्षक और सरल बनाना चाहिए, ताकि आम लोग अपने घरों में रखे सोने को बैंकिंग प्रणाली में जमा कराने के लिए प्रेरित हों। इसके अलावा डिजिटल गोल्ड, गोल्ड बॉन्ड और गोल्ड सेविंग्स जैसे विकल्पों को भी बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई गई है।
कुल मिलाकर, एसोचैम (ASSOCHAM) ने स्पष्ट किया है कि भारत के घरों में मौजूद सोना केवल निजी संपत्ति नहीं, बल्कि एक “छिपी हुई आर्थिक शक्ति” है। यदि इसे नीति-आधारित रणनीति के तहत अर्थतंत्र में सक्रिय किया जाए, तो यह देश को विकसित अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में महत्वपूर्ण गति प्रदान कर सकता है।


