गर न मानोगे जवानी में कहा मां-बाप का, याद आएगी ज़इफी में नसीहत की घड़ी
मस्जिद-ए-मोहम्मदी करेली में सजी ईद ए ज़हरा की महफिल
प्रयागराज (आलोक गुप्ता). शाहिद मुस्तफाबादी की ओर से करेली में मस्जिद ए मोहम्मदी में जश्ने ईद ए ज़हरा की महफिल सजाई गई, जिसमें शायरों ने एक से बढ़कर एक कसीदे पढ़े। आरिज़ नक़वी की निज़ामत में सजी महफिल में शायर हसनैन मुस्तफाबादी ने पढ़ा- दोनों ही ईमां को खा जाते हैं दीमक की तरहा, हो हसद की आग या हो फिर वह नफरत की आग।
शायर रौनक़ सफीपुरी ने पढ़ा- करबला में बादे इंकारे हुसैन इब्ने अली, ज़ंग आलूदा पड़ी है आज बैयत की घड़ी। डा. क़मर आब्दी ने अपने तास्सुरात का कुछ इस अंदाज़ में इज़हार किया। उन्होंने कहा- यह बदल देती है हूर जैसों की भी तक़दीर को,। दस्ततरस रखती है जन्नत तक निदामत की घड़ी। मौलाना व शायर आमिरुर रिज़वी ने पढ़ा- नर्म दिल हरगिज़ न हो बहरे उदूए फात्मा, वरना देखोगे क़यामत तुम क़यामत की घड़ी।
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हाशिम बांदवी ने नफरती तेवर से आगाह करते हुए पढ़ा- परचमे अखलाक़े अहमद लेके हम हाशिम चलें। इस दहर से खत्म हो जाएगी नफरत की घड़ी। इतरत नक़वी ने पढ़ा- गर न मानोगे जवानी में कहा मां-बाप का। याद आएगी ज़इफी में नसीहत की घड़ी। नन्हे शायर हसन ज़हीर व मोहम्मद अब्बास नकवी ने भी शेर सुना कर वाह वाही बटोरी।
इनके अलावा शायर रहबर मुस्तफाबादी, शाहिद मुस्तफाबादी ने भी अपने कलाम सुनाकर लोगों की दाद व तहसीन बटोरी। मौलाना वसी हैदर साहब क़िबला ने ईद ए ज़हरा पर अध्यक्षता के साथ तक़रीर की। पैग़ंबर ए इस्लाम की बेटी फात्मा ज़हरा की फज़ीलत बयान की। कहा वह पाकिजा खातून थीं, जिनकी अज़मत व ताज़ीम को खुद पैग़ंबर भी खड़े हो जाते थे। इस मौक़े पर मौलाना मोजिज़ अब्बास, मौलाना नजमुल हसन मीसम, पार्षद हाजी सलामत उल्ला, हैदर अब्बास नक़वी, ज़हीर अब्बास नकवी, मिर्ज़ा अज़ादार हुसैन, सैय्यद मोहम्मद अस्करी, फ़ैज़ मछलीशहरी, अज़हर खान, आरज़ू हैदर, आरिफ अब्बास, शबीह अब्बास रिजवी आदि शामिल रहे।


