
नई दिल्ली. हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं को आमतौर पर स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक वातावरण का प्रतीक माना जाता है, लेकिन हालिया वैज्ञानिक अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है। नए शोध में सामने आया है कि पश्चिमी भारत के रेगिस्तानी इलाकों से उठने वाली धूल भरी आंधियों के साथ हानिकारक बैक्टीरिया भी सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय कर हिमालय की चोटियों तक पहुंच रहे हैं, जिससे वहां रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
अध्ययन के अनुसार, ये धूल कण और उनमें मौजूद वायुजनित रोगजनक पहले घनी आबादी वाले और प्रदूषित इंडो-गंगा के मैदान से गुजरते हैं और अंततः पूर्वी हिमालय की पहाड़ियों में जमा हो जाते हैं। इन रोगाणुओं का संबंध श्वसन, त्वचा और पाचन संबंधी बीमारियों से पाया गया है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान बोस संस्थान के वैज्ञानिकों ने दो वर्षों से अधिक समय तक धूल भरी आंधियों की निरंतर निगरानी की। शोध में यह स्पष्ट हुआ कि शक्तिशाली धूल तूफान न केवल लंबी दूरी तय करते हैं, बल्कि अपने साथ ऐसे सूक्ष्मजीव भी ले जाते हैं जो मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि केवल दूर-दराज से आने वाले रोगाणु ही नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर उत्पन्न बैक्टीरिया भी वायुमंडलीय ऊर्ध्वाधर उत्थान के जरिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक पहुंच जाते हैं। जब ये स्थानीय और बाहरी रोगाणु आपस में मिलते हैं, तो हिमालय के ऊपर मौजूद जीवाणु समुदाय का स्वरूप बदल जाता है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
अंतरराष्ट्रीय जर्नल साइंस ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट में प्रकाशित इस अध्ययन को अपनी तरह का पहला शोध माना जा रहा है। इसमें लंबी दूरी तक धूल परिवहन और तलहटी क्षेत्रों के वायु प्रदूषण के संयुक्त प्रभाव से हिमालयी वायुमंडल में होने वाले जैविक बदलावों को वैज्ञानिक रूप से मापा गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के लिए अहम संकेत देता है। इसके निष्कर्ष राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्य योजनाओं को सुदृढ़ करने और ‘विकसित भारत@2047’ की परिकल्पना के अनुरूप उन्नत स्वास्थ्य पूर्वानुमान प्रणालियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।



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