हाईकोर्टः सहमति से संबंध बनाना और शादी से इंकार करना दुष्कर्म नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया अपराध और सहमति का अंतर
प्रयागराज (जगदीशचंद्र बुंदेला). इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अहम निर्णय में कहा है कि किसी महिला की सहमति से शारीरिक संबंध बनाना और बाद में शादी से इनकार करना दुष्कर्म या बलात्कार का अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि यदि शुरू में शादी का झूठा वायदा कर सेक्स संबंध बनाए गए हों, तो इसे साबित किए बिना किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।
अभिनाश शर्मा उर्फ अविनाश शर्मा के खिलाफ आजमगढ़ के बिलरियागंज थाने में शादी का झूठा वायदा कर बलात्कार करने का आरोप लगाते हुए एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। पीड़िता ने दावा किया कि याची ने शादी का वायदा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, लेकिन बाद में शादी से इंकार कर दिया।
कोर्ट ने केस को दुरुपयोग माना
कोर्ट ने देखा कि पीड़िता बालिग थी और चार महीने में दो बार सहमति से शारीरिक संबंध बने। कोई प्रमाण नहीं मिला कि शुरू से ही शादी का झूठा वायदा किया गया। साथ ही, एफआईआर में धमकी देने या एससी-एसटी एक्ट के तहत कोई अपराध सिद्ध नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि आपराधिक कार्रवाई जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
याचिका स्वीकार, केस रद्द
न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने याचिका स्वीकार करते हुए याची के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई रद्द कर दी। याची के वकील ने अदालत को बताया कि यदि आरोप सही मान भी लिए जाएं, तब भी अपराध नहीं बनता। सरकारी पक्ष का कहना था कि शादी का झूठा वायदा कर सेक्स करना गंभीर अपराध है, लेकिन कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि दुष्कर्म का आरोप संदेह से परे साबित होना आवश्यक है।
सहमति में कानूनी स्थिति
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यदि संबंध सहमति से बने हैं और बाद में अनबन या मतभेद के कारण शादी नहीं होती, तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता। दुष्कर्म के लिए शुरुआत से ही गलत मंशा और जबरदस्ती होना अनिवार्य है। इस मामले में पीड़िता ने स्वयं सहमति से संबंध स्वीकार किए, इसलिए याची के खिलाफ आरोप असंगत पाए गए।
